28 June 2021

भात प्रथा का बदलता स्वरूप!

भात प्रथा का बदलता स्वरूप!

लेखक: शीनू मोठसरा


भात प्रथा भारतीय विवाह संस्कृति में विवाह से पहले होने वाली रस्मों में से एक अहम रस्म है। कहा जाता है पहला भात कृष्ण जी ने सुदामा की बेटी की शादी में भरा था यह प्रथा उस सतयुग से आज के युग तक चली आ रही है। इस प्रथा से जुड़ी एक और कहानी जो प्रसिद्ध है वो है 'नानीबाई रो मायरो' जो कृष्ण जी के अपने भक्त नरसी की नातिन के विवाह में भक्ति पर विश्वास का प्रमाण है।

विवाह समारोह एक बड़ा उत्सव है जो सभी रिश्तेदारों और जान पहचान वाले लोगों का मिल जुलकर खुशियां मनाने का अवसर प्रदान करता है। विवाह से जुड़ी दहेज प्रथा से तो हम सभी वाकिफ हैं लेकिन भात प्रथा को लेकर हो सकता है सबके अलग-अलग विचार हों, किसी प्रथा को लेकर हमारा विचार उसे जिस रूप में हमारे आस पास निभाया जाता है इससे बनता है।

भात एक पुण्य!

बदलते दौर में समाज की सोच में बहुत बदलाव आए हैं। बेटियों को बोझ मानने वाले परिवारों की गिनती कम हो रही है। पिता अपने कृतित्व का पालन करते हुए बेटी का विवाह एक अच्छे परिवार में कर के अपनी जिम्मेदारी से राहत लेता है कि अब उसकी बेटी अपने परिवार में रहकर अपने पति के काम और बच्चों का लालन-पोषण कर खुशी गृहस्त जीवन व्यतीत करे।

बेटी का मायका हर सुख-दुख में उसके साथ खड़े रहने की कोशिश करता है। पिता के बाद भाई अपनी बहन की खुशियों और जरूरतों का ख्याल रखता है, रिश्तों में आन-जान और मेल जोल के प्रयाप्त प्रयास करता है। भाई की एक जिम्मेदारी मानी जाती है वो अपनी बहन का भात भरे, जो उसके बच्चों के विवाह की रस्म में लिया जाता है।

इस रस्म के अनुसार बहन अपने भाई को अपने बच्चों के विवाह का न्योता देने उसके द्वार जाती है। बहन का स्वागत तहेदिल से खुशियों और नाच गानों के साथ किया जाता है। विवाह के दिन भाई, बहन के आमंत्रण पर उसके घर अपने परिवार ,दोस्तों और रिस्तेदारों के साथ जाता है। चौखट पर तिलक से लेकर तोहफे देने तक खुद ही एक समारोह होता है।

भात प्रथा एक पुण्य का काम है, भाई के दिये तोहफों, मिठाई और आशीर्वाद उनके भानजा/भानजी के वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना करते हैं।


रीति रिवाज अगर अपने असल रूप में निभाये जायें तो वो परिवारों को जोड़ने, प्रेम-प्यार बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं परंतु आप इस बात से वाकिफ होंगे के बदलते दौर के साथ रिवाजों के भी मायने बदले हैं। 


भात बदलता रूप:

बेटियां या बहनें कभी बोझ नहीं होती, ये तो इसी समाज की बदलती हुईं नीतियां हैं जो उन्हे इस कटघरों में खड़ा करती हैं। दहेज देना पिता की मजबूरी बन जाता है। पर भात का पुण्य से मजबूरी का सफर, मजबूरी नहीं असंतुष्टि या लालसा है और इस प्रथा में पुरुषप्रधान समाज के साथ-साथ लड़कियों, औरतों की अहम भूमिका है। 
भात, एक भाई की जिम्मेदारी है पर उसे मजबूरी बनाने में उन बहनों का हाथ है जो इसे एक रस्म न मानकर एक व्यापार की तरह लेती हैं। वो ये तो याद रखती हैं कि उनका घर है, उनके बच्चे हैं तो उनका भाई अपनी जिम्मेदारी निभाए, वास्तव में कहे तो उनको, उनके तोहफे, जेवर और धन दे जितना वो चाहती हैं मगर वो बहन ये भूल जाती हैं कि उस भाई का भी परिवार है बाकी जिम्मेदारियां हैं। 

प्रेम से लालच की ये कहानी बहन भाई के रिश्ते में एक बड़ी दरार है। अनुमान नहीं अनुभव की बात है दहेज प्रथा जहां रिश्ता जोड़ती है, भात प्रथा का ये रूप रिश्ते तोड़ देती है।


मेरा विचार:

हम बेटियां जब अपने पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती तो फिर अपने भाई पर क्यों, विवाह के बाद ससुराल हमारा अपना घर है हमारे बच्चे हमारी जिम्मेदारी हैं। लालच को रिश्तों पर हावी मत होने दें यदि अपको लगता है कि आपके पिता की सम्पत्ति पर आपका हक है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन वो हक आप किस तरह जताती हैं बस फर्क इस बात का है। 

जीवन भर आपके पति आपके पति, बच्चों और ससुराल का सम्मान करने वाले उस भाई को पैसों में ना तौले। वो अपनी हैसियत के हिसाब से 11 लाख या 11 रुपये जो भी दे आशीर्वाद के रूप में स्वीकार कर रिश्तों को उम्रभर फलने फूलने का आशीर्वाद दें।

नोट: विचार निजी हैं, किसी को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं है।


09 May 2021

शाह ने राममाधव को लगाया ठिकाने।


बीजेपी के नेताओं के लिये बीजेपी में शामिल होने के बजाये RSS के रास्ते बीजेपी में जाना फायदे का सौदा रहा है। अब तक जितने भी नेता, RSS से बीजेपी में आए हैं सभी ने पार्टी में ठीक-ठाक पद-प्रतिष्ठा पाई है।

इस बीच दो ही नेता ऐसे दिखाई देते हैं जिनकी संघ से बीजेपी में आने के बाद भी दाल नहीं गल पाई, पहले थे संजय जोशी जिसको गुजरात में ही मोदी-शाह की जोड़ी ने ठिकाने लगाया, संजय जोशी अब न तो RSS के रहे न ही बीजेपी के।

दूसरा नाम है राममाधव। राममाधव के पिता भी संघ के स्वयंसेवक रहे हैं पिता के चलते माधव बचपन से ही संघ से जुड़े हुए हैं। राम माधव को पूर्व सर कार्यवाह सुरेश जोशी (भैया जी जोशी) का  करीबी माना जाता हैं। सुरेश जोशी की सिफारिश पर ही 2014 में सरकार बनने के तीन महीने के अन्दर ही राममाधव को बीजेपी में शामिल किया गया।

शुरुआत से ही सर कार्यवाह सुरेश जोशी और मोदी के बीच समीकरण ठीक नहीं रहे हैं जिसके चलते सुरेश जोशी ने राम माधव को पार्टी अन्दरखाने मोदी-शाह की जोड़ी पर नजर बनाये रखने के लिए पार्टी महासचिव बनाकर भेजा। अब राममाधव पर कोई भी निर्णय लेने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के पास था। अमित शाह ने राममाधव को न तो राज्यसभा भेजा और न ही 2019 का लोकसभा चुनाव लड़वाया। कैबिनेट में जगह देना तो दूर माधव को दिल्ली से दूर रखा गया।

राम माधव को जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर की जिम्मेदारी दी गई जिसे माधव ने बखूबी निभाया भी। जम्मू कश्मीर में बीजेपी की पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनवाने में राममाधव की मुख्य भूमिका रही थी। इसके बाद शाह ने राममाधव को जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर की जिम्मेदारियों से भी मुक्त कर दिया। 

मोदी के पहले कार्यकाल की शुरुआत से ही राममाधव मोदी के विदेशी दौरों के प्रबन्धक के तौर पर दिखाई दिए, न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर में हुए कार्यक्रम से लेकर अन्य विदेशी दौरों पर भी साथ दिखाई दिये। अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ के चलते माधव की अन्तरराष्ट्रीय मीडिया पर भी ठीकठाक पकड़ है। लेकिन माधव के बढ़ते कदम से शाह को परेशानी थी इसके बाद से माधव को विदेशी कार्यक्रमों से भी दूर रखा गया। 

पार्टी महासचिव के पद पर रहते हुए 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान राममाधव ने पार्टी के खिलाफ एक बयान दिया। राममाधव ने अपने बयान में कहा था कि 'बीजेपी बहुमत के आँकड़े से दूर रह सकती है।' अपने इस बयान को लेकर माधव पार्टी के शीर्ष नेताओं की आंखों में चढ़ गए। माधव के बयान का जवाब देते हुए नीतिन गडकरी ने नाराजगी जाहिर की थी। 

इसके बाद 2020 में जेपी नड्डा के पार्टी अध्यक्ष बनने के कुछ महीने बाद राममाधव को बीजेपी महासचिव पद से भी हटा दिया गया। हाल ही में बेंगलूरु में हुई संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में दत्तात्रेय होसबोले को नया सर कार्यवाह बनाया गया है।

संघ में सरसंघचालक के बाद यह नम्बर 2 की कुर्सी है। होसबोले मोदी के करीबी माने जाते हैं ऐसे में भागवत, होसबोले और मोदी तीनों एकमत के हैं। राम माधव के करीबी भैया जी जोशी के सर कार्यवाह पद से हटते ही और मोदी के करीबी होसबोले के नये सर कार्यवाह बनते ही राममाधव को बीजेपी से संघ में वापस बुला लिया गया है। इस गठजोड़ के बीच बीजेपी के अन्दर राममाधव के पैर जमना मुश्किल हो चुका था। इस तरह राममाधव को फिर से संघ में भेजकर मोदी-शाह की जोड़ी ने माधव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के सारे रास्ते बंद कर दिये।

13 August 2020

महिलाओं के अधिकार


पुरुष स्त्री को अपनी सम्पत्ति मानता है और यह नहीं मानता कि उसके ही समान स्त्री की भी भावनाएँ हो सकती हैं। महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने से क्यों रोका गया ताकि उन्हें उनकी मुक्ति से वंचित रखा जा सके और इस बहाने उन्हें दासी बनाया जा सके और साबित किया जा सके कि ये सोचने-विचारने या कोई कार्य करने में सक्षम नहीं है।



जमींदार अपने नौकरों और ऊँची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरुष उससे भी बदतर व्यवहार स्त्री के साथ करता है। जमींदार अपने नौकरों के साथ और ऊँची जाति के लोग नीची जाति के साथ भी ऐसा बुरा बर्ताव करते हैं, जब इन्हें उनसे खतरा महसूस होता है। लेकिन, पुरुष महिलाओं के प्रति उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक क्रूर व्यवहार करते हैं।

भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं चूंकि, हम इस बात को समझ नहीं पाते कि स्त्री की पराधीनता सामाजिक विनाश की ओर ले जाती है। इसीलिए, अपनी सोचने-विचारने की सामर्थ्य के चलते जिस समाज को विकास की सीढ़ियाँ चढ़नी चाहिए; वह दिन-ब-दिन पतन की ओर बढ़ता जाता है।

प्रत्येक महिला को एक उपयुक्त पेशा अपनाना चाहिए, ताकि वह भी कमा सके। अगर वह कम-से-कम खुद के लिए आजीविका कमाने में सक्षम हो जाए, तो कोई भी पति उसे दासी नहीं मानेगा। पुरुष के लिए एक महिला की रसिया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौन्दर्यबोध को सन्तुष्ट करने के लिए एक सुन्दर ढंग से सजी गुड़िया है। पता कीजिए, क्या इनके अलावा उनका उपयोग अन्य कार्यों के लिए भी हुआ है? महिलाओं की दासता केवल पुरुषों के कारण है पुरुषों की यह धारणा कि ईश्वर ने पुरुष को श्रेष्ठ शक्तियों से युक्त और स्त्री को उसकी गुलामी करने के लिए बनाया है और परम्परागत तौर पर स्त्रियों द्वारा इसे सत्य मानकर इसकी स्वीकार्यता-ये ही स्त्री की दासता को बढ़ावा देने वाले कारक तत्त्व हैं।

विवाह से पूर्व लड़का और लड़की की जोड़ी दोनों के रंग-रूप की संगतता, आपसी स्नेह और सही समझ तथा समान शिक्षा के आधार पर नहीं मिलाई जाती, बल्कि यह देखा जाता है कि क्या लड़की आज्ञाकारी होगी और लड़के की इच्छानुसार आचरण करेगी? लगभग उसी तरह से, जैसे गाय-बैल आदि खरीदते समय उन्हें देखा-परखा जाता है।

मंगल सूत्र का निहितार्थ यह है कि जब लड़का इसे लड़की के गले में बाँधता है, तभी से वह उसे अपनी दासी मान लेता है और लड़की भी उसकी दासी बनना स्वीकार कर लेती है। इस प्रकार पति अपनी पत्नी के प्रति चाहे जैसा भी व्यवहार करे; किसी को उसे रोकने-टोकने का अधिकार नहीं है और न ही उसके दुर्व्यवहारों के लिए दंड का प्रावधान है। आज की मध्यमवर्गीय महिलाएं अपनी शिक्षा, धन, व्यवहार-कुशलता सम्बन्धी ज्ञान, सम्मानित रिश्तेदार और एक आरामदायक जीवन जीने के बावजूद बहुत-ही पारम्परिक ढंग से व्यवहार करती हैं, जिससे उनमें देहाती लड़कियों से भी ज्यादा पिछड़ापन झलकता है। यह दुःख की बात है। ऐसी महिलाओं द्वारा जन्मे और उनके संरक्षण में पलने-बढ़ने वाले बच्चों में मानवीय गरिमा का भाव कैसे आएगा?

हमारे समाज की महिलाओं को स्वयं को जन्म से ही दासी मानने की प्रवृत्ति बदलनी चाहिए।

महिलाओं! साहसी बनिए। यदि आप अपने आचार-विचार में बदलाव लाती हैं, तो आपके पति और अन्य पुरुषों को भी बदलने में आसानी होगी। पुरुष आप पर यह आरोप लगाते हैं कि आप पिछड़ी हैं। अपने आप पर यह आरोप मत लगने दीजिए। अपनी स्थिति को यूँ मजबूत बनाइए कि भविष्य में इसकी बजाय कि आपको 'अमुक व्यक्ति की पत्नी के रूप में पहचाना जाए आपके पति को 'अमुक महिला के पति' के तौर पर ललित किया जाए।

पति का लाड़-प्यार पाने वाली महिलाएं, जिनको वाहनों और परिधानों का अत्यधिक मोह होता है; जो स्त्रियोचित सौन्दर्य और फैशन के आकर्षण में फंसी रहती हैं तथा जो धनाढ्य और अभिमानी होती हैं; वे अपनी इसी निष्क्रिय अवस्था में सन्तुष्ट रहेंगी। वे दुनिया में कोई सुधार लाने में सहायक सिद्ध नहीं होंगी। महिलाओं को उपहास की वस्तु समझने तथा पुरुष के मन बहलाने की चीज मानने के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे खुद ही अभद्र ढंग से व्यवहार करती हैं। जो महिलाएं खुद को फैशनेबल और आधुनिक समझती हैं, वे मात्र बढ़िया परिधान तथा आभूषण पहनकर आकर्षक दिखने से ही स्वयं को सभ्य मानती हैं उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि पुरुषों के साथ समान दर्जे का सम्बन्ध ही वास्तविक सभ्य जीवन का आधार है।

'प्राथमिक शिक्षा' शब्द को सर्वप्रथम महिलाओं के लिए प्रयोग लाया जाना चाहिए। क्योंकि, 6-7 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के लिए तो असल में वे ही प्राथमिक शिक्षक हैं।

हिन्दू-धर्म में ज्ञान की और धन की देवियों को पूजा जाता है। फिर ये देवियाँ महिलाओं को शिक्षा तथा सम्पत्ति का अधिकार प्रदान क्यों नहीं करती? महिलाओं को तर्कसंगत ज्ञान और वैश्विक मामलों से सम्बन्धित पर्याप्त शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्हें ऐसे साहित्य इतिहास या कहानियाँ से
दूर रखा जाना चाहिए, जो अन्धविश्वास और भय को जन्म देती हैं। महिलाओं
की पराधीनता के कई कारणों में से प्रमुख कारण यह है कि उन्हें सम्पत्ति का अधिकार नहीं है। (हालांकि अब कानून ने महिलाओं को बराबर की सम्पत्ति का अधिकार दे दिया है)

समाज में पुरुषों की प्रधानता ने उन्हें निरंकुश बनाया है। इसका एक प्रमाण यह है कि हमारी भाषाओं में पुरुष की शुचिता' के लिए कोई लक्षण निर्धारित नहीं किया गया है शुचिता के नाम पर पति द्वारा पत्नी के प्रति बरती जाने वाली क्रूरता को, जिसे पत्नी को हिंसा के रूप में भी सहन करना पड़ता है, समाप्त कर देना चाहिए।

अगर किसी महिला को सम्पत्ति का अधिकार और अपनी पसन्द से किसी को चुनने तथा प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं है, तो वह पुरुष की स्वार्थ-सेवा करने वाली एक रबड़ की पुतली से ज्यादा और क्या है? शुचिता' को केवल स्त्रियों पर लागू करने और पुरुष को इससे मुक्त रखने का हठ, पूर्वग्रह युक्त व्यक्तिगत स्वामित्व पर आधारित धारा है। स्त्री पुरुष की सम्पत्ति है; यही विचार पत्नी की वैध स्थिति निर्धारित करता है। यदि हमारा सम्पूर्ण साहित्य न्याय और अनुशासनबद्ध आचरण के निमित्त रचा गया है, तो महिलाओं पर लागू सभी नियम कानून पुरुषों पर भी समान रूप से लागू नहीं होने चाहिए?

संसार में यही दावा किया जाता रहा है कि स्वतंत्रता तथा साहस केवल 'पुरुष' के लक्षण हैं। अतः पुरुष समाज ने यह निश्चय कर लिया कि ये ही गुण 'पुरुष की श्रेष्ठता' को परिभाषित करते हैं । जब तक दुनिया में पुरुष की श्रेष्ठ कायम रहेगी, महिलाओं की पराधीनता जारी रहेगी। निश्चित तौर पर महिलाएँ तब तक स्वतंत्रता हासिल नहीं करेंगी, जब तक कि वे पुरुष-वर्चस्व की रीति को समाप्त नहीं कर देतीं। पुरुष को अपनी यौन-साथी चुनने की छूट और उसे जितनी मर्जी उतनी पत्नियाँ वरण करने की अनुमति स्वच्छंद सम्भोग का कारण बनती है। लोग महिलाओं की स्वास्थ्य-सुरक्षा और पारिवारिक सम्पत्ति के संरक्षण के उद्देश्य से गर्भ निरोध का समर्थन करते हैं। लेकिन, हम इसकी वकालत महिलाओं की मुक्ति के लिए करते हैं। चूंकि, पुरुषों पर ऐसा कोई भार नहीं होता। इसलिए, समाज में उनकी स्थिति इतनी दृढ़ है कि उन्हें यह घोषित करने में कोई आपत्ति नहीं होती कि वे महिलाओं के बिना रह सकते हैं। इसके साथ ही मातृत्व से सम्बन्धित समस्याएँ महिलाओं को दूसरों की सहायता लेने के लिए विवश कर देती हैं। जिससे पुरुष वर्चस्व को बढ़ावा मिलता है। इसलिए, महिलाओं की असली मुक्ति के लिए उन्हें सन्तानोत्पत्ति की कष्टप्राय बाध्यता से पूरी तरह मुक्त कर देना चाहिए।


पति-पत्नी नहीं, एक-दूसरे के साथी बनें

विवाहित दम्पतियों को एक-दूसरे के साथ मैत्री-भाव से व्यवहार करना चाहिए। किसी भी मामले में पुरुष को अपने पति होने का घमंड नहीं होना चाहिए। पत्नी को भी इस सोच के साथ व्यवहार करना चाहिए कि यह अपने पति की दासी या रसोइया नहीं है। विवाहित दम्पती को बच्चे पैदा करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। विवाह के कम-से-कम तीन साल बाद बच्चे पैदा हों, तो अच्छा रहेगा। विवाहितों को अपनी कमाई के अनुसार खर्च करना चाहिए। उन्हें उधार नहीं लेना चाहिए। भले ही आय कम हो; उन्हें किसी भी तरह थोड़ी-सी बचत करनी चाहिए। इसी को मैं जीवन का अनुशासन कहूँगा।

विवाहित लोगों को एक-दूसरे के प्रति सरोकार रखने वाला होना चाहिए। भले ही वे दूसरों के लिए ज्यादा कुछ न कर पाएँ; लेकिन उन्हें दूसरों का अहित करने से बचना चाहिए। कम बच्चे होने से ईमानदारी और आराम से जीवन व्यतीत किया जा सकता है। विवाहित लोगों को अपने जीवन को दुनिया की वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल ढालने के लिए हर तरह से प्रयास करना चाहिए। भविष्य में दुनिया कैसी होगी? इसे भूलकर उन्हें वही करना चाहिए, जो वर्तमान दुनिया में जीने के लिए आवश्यक है।

'पति' और 'पत्नी' जैसे शब्द अनुचित हैं। वे केवल एक-दूसरे के साथी और सहयोगी हैं; गुलाम नहीं। दोनों का दर्जा समान है। जिस देश या समाज में प्रेम को स्वतंत्र रूप से फलने-फूलने का अवसर मिलता है; वही देश ज्ञान, स्नेह, संस्कृति और करुणा से समृद्ध होता है। जहाँ प्रेम बलपूर्वक किया जाता है, वहाँ केवल क्रूरता और दासता बढ़ती है। जीवन

में एक-दूसरे की अपरिहार्यता को समझना एक उदात्त प्रेम की पहचान है। नैतिक आचरण की सीख देने वाली कोई भी किताब या धर्म-ग्रंथ यह नहीं सिखाता कि एक बाल वधू को वैवाहिक बन्धनों में बँधकर तथा पारिवारिक जीवन में उलझकर, पति के संरक्षण की बेड़ियों में कैद रहना चाहिए; जबकि अपनी उम्र के अनुसार वह इसके लिए तैयार नहीं है। नागरिकों और पुलिस, दोनों को अवैध विवाह से सम्बन्धित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने

का अधिकार होना चाहिए। विवाह को केवल लैंगिक समानता तथा स्त्री-पुरुष के बीच समान व्यवहार के सिद्धान्त पर अनुरोध किया जाना चाहिए। अन्यथा यही बेहतर होगा कि महिला तथाकथित 'पवित्र वैवाहिक जीवन' से बाहर एकल जीवन जिएँ। स्त्री पुरुष की गुलाम बनकर क्यों रहे? विवाह पर किया जाने वाला खर्च लोगों की 10 या 15 दिनों की औसत आय से अधिक नहीं होना चाहिए। एक और बदलाव यह लाया जा सकता है कि विवाहोत्सव को कम दिनों में मनाया जाए।

मैं 'विवाह' या 'शादी' जैसे शब्दों से सहमत नहीं हूँ। मैं इसे केवल जीवन में साहचर्य के लिए एक अनुबन्ध मानता हूँ। इस तरह के अनुबन्ध में मात्र एक वचन; और यदि आवश्यकता हो, तो अनुरोध के पंजीकरण के एक प्रमाण की जरूरत है। अन्य रस्मों-रिवाजों की कहाँ आवश्यकता है? इस लिहाज से मानसिक श्रम, समय, पैसे, उत्साह और ऊर्जा की बर्बादी क्यों? समाज में कुछ लोगों की स्वीकृति पाने और अपनी प्रशंसा सुनने हेतु लोग दो या तीन दिनों के लिए विवाह में अतार्किक ढंग से अत्यधिक खर्च कर देते हैं; जिसके कारण वर-वधू या उनके परिवार लम्बे समय तक कर्ज में डूबे रहते हैं। खर्चीले विवाहों के कारण कुछ परिवार कंगाल हो जाते हैं।

यदि पुरुष और महिला रजिस्ट्रार कार्यालय में हस्ताक्षर करके यह घोषणा कर देते हैं कि वे एक-दूसरे के 'जीवनसाथी बन गए हैं; तो यह पर्याप्त है। मात्र एक हस्ताक्षर के आधार पर किए गए ऐसे विवाह में अधिक गरिमा लाभ और स्वतंत्रता होती है।

हमें विवाह के पारम्परिक रीति-रिवाजों का पालन करने की जरूरत नहीं है। समय और समाज के मिजाज तथा ज्ञान में हो रही वर्तमान वृद्धि के अनुसार ही रीति-रिवाज स्थापित किए जाने चाहिए। यदि हम सदा के लिए किसी विशेष काल के तौर-तरीकों का पालन करते रहें, तो स्पष्टत: हम ज्ञान के मामले में आगे नहीं बढ़े हैं।

आत्माभिमान विवाह परम्परागत रूप से चलती आ रही प्रथाओं पर प्रश्न उठाने और उन्हें चुनौती देने के लिए शुरू किए गए हैं। विवाह से केवल वर-वधू का ही सरोकार नहीं होता। यह राष्ट्र की प्रगति के साथ जुड़ा होता है।

-पेरियार ई वी रामासामी   

26 June 2020

एक गलतफहमी...

आज से 23 साल पहले आंखें खुली और पहली बार दुनिया देखी. दुनिया में कुछ अपने और कुछ पराये जिन्हे हम समाज कहते हैं,जाहिर सी बात है जब तक मुझे इल्म भी नहीं था कि लड़की क्या होती है, सबने कह दिया होगा अरे लड़की हुई है कोई ना अगली बार लड़का होगा. 

लड़की कौन है ये और लड़का इतना क्यों जरूरी है.सवाल तो मन में होता ही है, बचपन से लेकर बड़े होने तक हर चीज लड़के को पहले दी जाती है. उसके खिलौने, उसकी साइकिल, उसकी पढ़ाई सब मानो उसका ही है बस तो फिर हमे गलतफहमी होना लाज़मी है कि काश में भी लड़का होती तो शायद सभी मुझे इतना ही प्यार करते. 

हां बहुत बुरा लगता है जब लड़की की पढ़ाई बंद करवा कर लड़के को कॉन्वेंट स्कूल में भेजा जाता है तो फिर आता है काश मैं लड़का होती. पर कभी समझ नहीं आता जैसे उसमें उन्के जीन्स हैं मुझमें भी,वो उनकी औलाद है मैं भी हूं फिर ये भेदभाव क्यों.इस कशमकश में की यार भगवान मुझे लड़की क्यों बनाया जिंदगी का एक चौथाई हिस्सा निकल जाता है.


असली इम्तिहान अब शुरू होता है जब जिंदगी समझ आने लगती है जब ये पता लगता है कि शुक्र है कि मैं लड़की हूं, लड़का नहीं जब हम भगवान को दिल से शुक्रिया करते हैं कि हर जन्म में मोहे बिटिया ही कीजो...हैरानी हो रही होगी कि मैं ऐसा क्यों कह रही हूं...


आपके सवाल का जवाब

आपके भाई के पैदा होने पर सभी लोग बहुत खुश होते हैं. उसे सभी महंगे खिलौने दिलवाये जाते हैं, कॉन्वेंट की पढ़ाई से लेकर टॉप क्लास तक डॉनेशन दिया जाता है पर क्यों...अभी नहीं समझ आया तो गौर से सोचिए आपकी शादी के लिए मां-बाप लड़का ढूंढ रहे हैं.उन्कों एक लड़का पसंद आया बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती, उसके बाद पता किया जाता है कि उसकी कीमत क्या है मतलब आपके पापा जिन्होने हो सकता है आज तक आपकी बहुत सी मांगे पूरी नहीं की होंगी आपके लिए जीवनसाथी के रूप में लड़का खरीदते हैं क्योंकि अगर उन्होनें अपने बेटे को बेचने के लिए तैयार ना किया होता तो आज उन्कों  किसी और का बेटा खरीदना नहीं पड़ता...तो मुबारक हो आप लड़की हैं आपकी कीमत रुपयों में तय नहीं की जाएगी होप कि आपकों गर्व होगा कि आप लड़की हैं.


मैं खुशकिस्मत हूं क्योकिं मैं लड़की हूं और ना ही मेरे माँ-पापा ने मेरे भाई की कीमत लगाने के लिये पढ़ाया और ना ही कभी ऐसा हुआ की मेरी डिमानड्स ना पूरी हुई हों...मेरे लिये जीवनसाथी खरीदने से ज्यादा उनकों मुझे पढ़ाना जरूरी लगा....शुक्रिया पापा धर्मपाल मोठसरा; माँ मूर्ति मोठसरा


- शीनू मोठसरा

26 March 2020

एक बार फिर जी लो...


मार्च 2020 अभी सब नोर्मल ही था स्कूल जाते बच्चे को एग्जाम की चिंता, SSC और UPSC के सारे एस्पाइरेंट्स अपना बेस्ट देने में लगे थे। घर पर मां को खाने और सफाई की चिंता और पीछे बहुत सालों से पापा की ऑफिस वाली वही जिंदगी। ताजुब की बात ये थी की एक उम्र सी बीत गई थी वक्त को  ठहरे हुये सबकी जिंदगियां इतनी तेजी से चल रही थीं की किसी ने रुकने का सोचा ही नहीं, सबको आगे ही बढ़ना था। एक खबर थी अखबारों में कि दुनियां के एक हिस्से में कुछ हो रहा था पर अभी तक हमारे यहां जिंदगी रफ्तार में ही थी, कुछ लोगों ने मजाक भी बनाया की जो बुरा करते हैं उनके साथ ही होगा हमें कुछ नहीं होगा।

मेरी दादी एक कहानी सुनाती थी कि आज से बहुत साल पहले कभी महामारी आयी थी ऐसे हालात थे उस वक्त की अगर एक का अंतिम संस्कार करके आए तो दूसरी जिंगदी उससे पहले दम तोड़ रही थी। इस कहानी वाले लोगों में मेरे पूर्वजों में से भी तीन बच्चों ने ऐसे ही अपना दम तोड़ा। पर यकीन मानिए हमेशा ऐसा लगता था कि अब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऐसा आगे तो शायद कुछ ना हो।तीसरे विश्वयुद्ध का डर तो दिल में था पर सोचा ना था कि वो किसी वायरस के रूप में आएगा जहां वायरस बनाम पूरी दुनिया होगी। 

आप सोचकर देखिये हमारी जिंदगी इतनी रफ्तार से चल रही थी कि ब्रेक लगने पर भी झटका तेजी से लगता पर यहां पर तो रुकना था। कई बार सुना था लॉकडाउन के बारे में कश्मीर के उन लोगों के लिये दुख भी हुआ जो एक लम्बे वक्त तक अपने घरों में कैद रहे पर कभी उनका दर्द महसूस नहीं हुआ क्योकिं कभी कुछ ऐसा जिया ही नहीं। हाँ  एक फ़र्क है उनमें और हममें शायद उन्हें मौत का डर नहीं रहा पर अब हमें है। हम अपने आस-पास पड़ोस के उन लोगों से भी डर रहे हैं जिनके साथ हम जिन्दगी के इतने साल रहे हैं। 

एक ही गुजारिश है मेरी आप सब से की माना  की हम अपनी मर्जी से नहीं ठहरे हैं। पर अब जब हम रुक ही गए हैं तो थोड़ा आराम कर लिजिये, जिन्दगी का कुछ वक्त खुद के लिये निकालिए और जो बीत गया उस पर एक बार झांक कर देखिये की इस रेस में आगे बढ़ते-बढ़ते कहीं हम खुद को ही ना भूल गये हों। 

अगर आपको अपना घर कैद लग रहा है तो एक बार अपने जीवनसाथी की शिकायतें सुनिये और समझने की कोशिश करके देखिये। बुजुर्ग माँ बाप को भी जिन्होनें जिन्दगी दी शुक्रिया कह दीजिये। बहन भाई की जिन शरारतों ने जिन्दगी में रंग भर दिये उन्हे फिर याद कर लिजिये। उन बच्चों के साथ जिनकों समय ना होने के कारण आपने वीडियोगेम या मोबाइल फोन दिये ताकि आपकी कमी शायद वो चीजें पूरी कर दें उनकों वो वक्त दे के देखिये यकीन मानिये कैद कब जन्नत हो जाएगी और वक्त हँसते कब गुजर जाएगा पता ही नहीं लगेगा। अपनी दुनिया उस घर की दिवारों में फिर जन्नत  बनाकर यकीन मानिये आप खुद को भी सुरक्षितरखेंगे अपने परिवार को भी और पूरी दुनिया भी आपकी कर्जदार रहेगी।

शुक्रिया
मुस्कुराते रहिये
शीनू मोठसरा



29 July 2018



कालबेलिया समुदाय   

साँप की कलाकृतियों से सजे चमकदार, चाँदी और शीशे से सजे काले रंग के परिधानों में सपेरों की बीन के लहरें, ढोलक की थाप, डफली और खंजरी जैसे वाद्य यंत्रो से निकली धुन पर लोक नृत्य करती कालबेलिया घुमंतु जनजाति की महिलाएँ सदियों से राजस्थान के ‘कालबेलिया’ लोक नृत्य को संजोए हुए हैं।









कालबेलिया लोक नृत्य राजस्थान का बहुत चर्चित और प्रसिद्ध लोक नृत्य है। इस लोक नृत्य की प्रस्तुति कालबेलिया नाम की ही जनजाति के लोगों द्वारा की जाती है। इस लोक नृत्य का नाम भी इसी कालबेलिया जनजाति के नाम पर पड़ा है। इस नृत्य की प्रस्तुति ख़ास उत्सवों पर दी जाती है। कालबेलिया नृत्य की धूम भारत ही नहीं पूरे विश्व में मानी जाती है।


2010 में यूनेस्को ने कालबेलिया नृत्य को अमूर्त विरासत सूची में डाल कर इस लोक नृत्य के साथ-साथ कालबेलिया समुदाय को भी विश्व स्तर पर पहचान दी। इस नृत्य को देखने और सीखने के लिए लोग विदेशों से आते हैं।   

ये लोग गौरखनाथ को अपना देवता मानते हैं तथा सर्प पूजा में विश्वास रखते है। कालबेलिया समुदाय के लोगों का मुख्य पेशा साँप पकड़ना, सर्प विष का व्यापार करना, तथा सर्प दंश का उपचार करना रहा है। परंतु 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम आने के बाद से इन लोगों के साँप पकड़ने तथा इससे जुड़े छोटे-मोटे काम भी बंद हो गए।

इन लोगों के पास स्थाई मकान ना होने के कारण ये एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते हैँ। निरंतर घूमते रहने की वजह से ही कालबेलियों  का राजस्थान की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं से लगाव हो गया। फिर ये लोग इन वनस्पतियों से जुड़ी हुई तरह-तरह की जड़ी-बुटियां बनाने लगे तथा इन्हे बेचकर ही थोड़ा बहुत कमाते रहे थे परंतु अब वह भी नहीं रहा। 


विडंबना देखिए जिस जनजाति ने राजस्थान के लोक नृत्य को संजोए रखा और विश्वपटल पर ख़्याति दिलाई, उसी जनजाति की, समाज और सत्ताशीनों ने अनदेखी की। कालबेलिया जनजाति के लोगों के साथ आज भी समाज अस्पृश्यता का व्यवहार करता है। ये लोग जिस गाँव में ठरहरने के लिए डेरा डालते है वहाँ के लोग इनकों कुछ ही दिनों के अंदर वहाँ से दूसरी जगह जाने पर मजबूर कर देते हैं।

स्थानीय लोगों की ओर से इन लोगों पर चोरी और झगड़ा करने का आरोप लगाया जाता है जिसके बाद ये लोग उस स्थान को छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। समाज ने कालबेलिया जनजाति को मुख्यधारा से विमुख कर मानो बहती नदी के किनारे छोड़ दिया हो।

आज इस समुदाय के लोग दो जून की रोटी के लिए तंगहाल स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ये लोग सड़कों, चौराहों पर अपनी बीन के लहरे से मनोरंजन कर लोगों की कृपाद्रष्टि के पात्र होकर गुजर-बसर कर रहे हैं। 






16 March 2018

जाति के नाम पर गर्व करने लायक क्या ?  


जाति के बखान से लोगों को कौन-से रस की तृप्ति होती है समझ से परे है. 


10 November 2017

चन्द्रशेखर पर रासुका ? 

क्योंकि चन्द्रशेखर किसी राजनेता का बेटा नहीं है, क्योंकि वह किसी व्यवसायी का बेटा नहीं है क्योंकि वह किसी रसूख़दार के घर पैदा नहीं हुआ है.

इसी साल मई-जून में उत्तरप्रदेश के सहारनपुर ज़िले के शब्बीरपुर में दलितों और ठाकुरों के बीच हिंसक घटनाएं हुई थीं. ठाकुरों ने बाबा साहेब अंबेड़कर के जन्मोत्सव पर दलित समुदाय को अम्बेड़कर मूर्ति स्थापना व झलसा निकालने से रोका था. वहीं इसके बाद फिर अगले ही महीने माहाराणा प्रताप जयंती पर दलितों ने उस बात का हवाला देते हुए कि उन्हें बाबा साहेब के जन्मोत्सव पर कार्यक्रम नहीं करने दिया गया था, तो अब वो भी किसी तरह का जुलूस नहीं निकालने देंगे. 




इसी टकराव की स्थति ने दोनों समुदायों के बीच हिसंक घटनाओं को अंजाम दिया. लगभग एक महीने तक रह-रहकर चली इन हिंसक घटनाओं में दलितों की बस्ती में प्रशासन की मौजूदगी में आग लगा दी गई, इन लोगों पर खुलेआम तलवारों से हमला किया गया तथा महिलाओं के शोषण की घटनाएं भी सामने आई. 

वहीं दलितों पर अत्याचार के विरोध में खड़े हुए भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर पर देशद्रोह का केस बना कर जेल में डाला गया. चन्द्रशेखर ने भीम आर्मी की स्थापना 2015 में की थी जिसका मकसद आए दिन दलित समुदाय पर होते आ रहे हिंसक हमलों का प्रतिकार करना था. इस संगठन का दावा है कि ये लोग संविधान के दायरे में रहकर दलितों पर होने वाली हिंसक घटनाओं का प्रतिकार करते आए हैं. 



वही कुछ लोग भीम आर्मी के अस्तित्व पर ही उंगली उठा रहे हैं कि इस तरह के संगठन समाज को बांटने का काम करते हैं परंतु इस प्रकार के तर्क देने वालों को यह नहीं भुलना चाहिए की इसी देश में हिन्दु युवा वाहिनी, हिन्दु सेना, राजपूत करणी सेना, क्षत्रिय सेना जैसे तमाम संगठन हैं. वहीं अगर गौरक्षा के लिए भारतीय गौरक्षक दल हो सकता है, तो अपने लोगों की रक्षा के लिए चन्द्रशेखर भीम आर्मी संगठन बनाता है तो इसमें ग़लत क्या है? 

चंद्रशेखर को कभी नक्सली कहा जाता है तो कभी प्रदेश की क़ानून व्यवस्था भंग करने के आरोपी के तौर पर रासुका( राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) लगाया जाता है.परंतु दलित बस्ती में आग लगाने वाले तथा उन लोगों पर जुल्म डहाने वाले दबंग और रसुखदारों को अब तक जे़ल में भी नहीं डाला गया है. शेर सिंह राणा जो सांसद फुलन देवी की हत्या में सजायाफ़्ता है और अभी जमानत पर हैं, उस पर लोगों ने आरोप लगाए हैं कि इस घटना के पीछे शेर सिंह राणा का हाथ है. ऐसे मे यह चिंता का विषय है कि हाशिए के लोगों के लिए क़ानून के हाथ छोटे क्यो पड़ जाते हैं. 

चन्द्रशेखर आज़ाद का भीम आर्मी बनाने के पीछे का तर्क है कि दलितों पर आए दिन हमले होते रहते हैं तथा दलित समाज को नीचा दिखाने का प्रयास हमेशा से होता रहा है. जिसका कारण है, लम्बे अरसे से अपने सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीनें के सवैंधानिक अधिकार को आज तक भी ये लोग आत्मसात नहीं कर पाए हैं. वही आज दलित युवा पढ़-लिख कर आगे बढ़ रहें है तथा वे अपने हक़ों और अधिकारों को प्राप्त करने के लिए रास्ता अख्तियार करना जानते हैं.



चंद्रशेखर के सोशल मीडिया पर एक आह्वान पर हज़ारों युवा दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्र हो जाते हैं. यह पहला मौका था जब नई पीढी़ के पढ़े-लिखे दलित युवा देश भर से इतनी बड़ी संख्या में एकत्र हुए हों. इन लोगों के लिए सोशल मीडिया वरदान की तरह काम कर रहा है क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया में इन लोगों की आवाज़ उठाने वाला कोई दिखाई नहीं पड़ता है. 

1973 की रासुका से जुड़ी एक रिपोर्ट के अनुसार 72 फीसदी लोगों पर लगाया गया रासुका ग़लत साबित हुआ जिसे बाद में हटाना पड़ा इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि सत्ताधारी लोग किस तरह से रासुका का प्रयोग उनकों चुनौती देने वालों के खिलाफ करती आईं हैं. ऐसा ही चन्द्रशेखर के मामले में भी दिखाई दे रहा है. चन्द्रशेखर को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन पर दर्ज सभी मामलों में जमानत दे दी थी परंतु जिस दिन 'आजाद' को आजाद होना था उसी दिन सरकार ने रासुका लगा कर 'आजाद' को फिर से कैद कर दिया. 



अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया के ज़रिए चन्द्रशेखर की एक तस्वीर सामने आई जिसमें चन्द्रशेखर व्हीलचेयर पर बैठा हुआ दिखाई दिया था इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि चन्द्रशेखर के साथ जेल प्रशासन किस तरह पेश आ रहा है.  क्योंकि चन्द्रशेखर किसी राजनेता का बेटा नहीं है, क्योंकि वह किसी व्यवसायी का बेटा नहीं है क्योंकि वह किसी रसूख़दार के घर पैदा नहीं हुआ शायद यही वजह है कि जो चन्द्रशेखर मुच्छो में तांव देकर अपने पैरो पर जेल गया था वह अब व्हीलचेयर पर दिखाई दे रहा है.  

17 October 2017

ताजमहल पर कर्कश संगीत।


ताजमहल पर कर्कश संगीत।   

"कैसा इतिहास, कहाँ का इतिहास, कौन-सा इतिहास, हम इतिहास बदल देंगें". ये वाक्य कहने वाला इतिहास का कैसा छात्र रहा होगा, आप इस ब्यान से अंदाजा लगा सकते हैं. 











यह ब्यान उतर प्रदेश में मेरठ की सरधना सीट से विधायक संगीत सोम ने दिया है संगीत सोम हमेशा से अपने उट-पटागं ब्यानों के लिए जाने जाते रहे हैं. कभी अपने चुनाव प्रचार में दंगों के समय के भाषण चला कर तो कभी सरेआम आम सभाओं में भड़काऊ भाषण देकर नफ़रत के बीज बोते रहे हैं. इसे हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही समझ लीजिए देश के कुछ नेता अपने ओछे कामों से ही राजनीति में बने रहते हैं. इससे पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी भी, "ताजमहल पर गर्व करने जैसी कोई बात नहीं है", कह कर उनका और उनकी सरकार का ताजमहल के प्रति विद्वेश दिखा चुके हैं.    

चलों इसी बहाने ही सही इन लोगों ने यह तो स्वीकार किया की ताजमहल को शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था. वरना इससे पहले ये लोग ताजमहल के इस अस्तित्व को ही नकार रहे थे जिसके चलते सुब्रमण्यन स्वामी ने तो ताजमहल को लेकर केस भी फाइल किया हुआ है. देश की एक विचारधारा के धडे़ द्वारा ताजमहल को शिवालय़ बताया जाता रहा है तो वहीं सरकार के पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने अपने ब्यान में कहाँ कि यह सब निराधार बातें हैं, ताजमहल, ताजमहल ही है.   

कभी मुग़ल काल में अकबराबाद के नाम से जाना जाने वाला आगरा शहर अकबर, जहांगीर और शाहजाहं के काल में राजधानी भी रहा है. इस शहर को चार चांद लगाने का काम शाहजहां ने ताजमहल बनवा कर किया था. आगरा की पहचान ताजमहल से ही रही है. 'ताज आगरा की आबों हवा में है, ताज से आगरा की हवा में ताजगी है. ताज से आगरा की फिज्जा में मोहब्बत है, ताजमहल आगरा के सिर का ताज है. ताजमहल आगरा ही नहीं भारत को भी विश्वपटल पर पहचान दिलाने वाली ऐतिहासिक इमारत है'. ताज के ये कसीदे मेरे एक मित्र ने पढ़े हैं जो आगरा के ही रहने वाला है. 

ताजमहल जिसको खड़े हुए आज लगभग 350 साल से ज्यादा हो चुके हैं उम्र के लिहाज से बुजुर्ग होते हुए भी यह जवानों से ज्यादा कमाई कर रहा है. टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन सालों में ताजमहल की कमाई लगभग 75 करोड़ रही है जो अपने आप में भारत के पर्यटन स्थलों में सबसे ज्यादा है.  

शाहजहां बहुत बड़े वास्तुकला प्रेमी थे उनके काल में ही सबसे ज्यादा भव्य ईमारतों का निर्माण हुआ था. आगरा के ताजमहल के अलावा आगरा का लाल किला (जहां पर शाहजहां को उन्कें बेटे औरंगजेब ने बंदी बना कर रखा था), व दिल्ली का लाल किला जिसकी प्राचीर से आजादी के बाद से सभी प्रधानमंत्री तिरंगा लहराते आए हैं, ये सब ऐतिहासिक ईमारतों का निर्माण करवाने वाले शाहजाहं ही थे. वहीं दिल्ली के लाल किले में स्थित दिवाने-ए-खास के बारे में तो मशहूर कवि अमिर खुसरों ने यहां तक लिखा है कि "धरती पर अगर कही स्वर्ग है तो यही है, यही है, यही है".  

ताजमहल से जुड़े इतिहास के इस पहलू से भी मुंह नही मोड़ा जा सकता कि ताजमहल को बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए गए थे जो उस समय का एक बहुत बड़ा अमानवीय कृत्य रहा होगा जिसमें लगभग बीस हजार मजदूरों को अपंग कर दिया गया था. शाहजांह को डर था कहीं कोई दूसरा ताजमहल ना बनवा दे परंतु यह उनकीं सबसे बड़ी गलती रही क्योंकि उस समय कोई आर्थिक रुप से इतना मजबूत नहीं था की ताजमहल बनवा सकता. 

लेकिन हमे नहीं भूलना चाहिए कि वो दौर राजशाही का दौर था जिसमे राजा को जो ठीक लगे वही होता था वो एक तरह से तानाशाही का काल था. कुछ लोग आज उन मजदूरों पर हुए अन्याय को लेकर ताजमहल की रंगत को कम करने का प्रयास कर रहे हैं, हां उन सबके साथ अन्याय हुआ इस बात में कोई दोराय नहीं हो सकती, परंतु आज जो लोकशाही के दौर में हो रहा है, आज देश में लोगों को गाय के नाम पर, जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, स्वतंत्र लेखन के नाम पर मारा जा रहा है, उसका क्या? ऐसे में संगीत सोम का कर्कश संगीत इन लोगों के न्याय के लिए भी आलाप करेगा क्या? शायद कभी नहीं. 

राजनीति में इस तरह की मानसिकता रखने वाले नेताओं का स्कोप बढ़ता जा रहा है जो अपनी ब्यानबाजी से समाज को बांटने, नफरत फैलाने का काम करते है सभी पार्टियों में इस तरह के नेता आपको देखने को मिल जाएंगे परंतु भाजपा इस मामले में ज्यादा आगे निकल चुकी है।

31 March 2017

सरकार की पारदर्शिता पर सवाल.


हाल के दिनों में संसद के दोनों सदनों में चर्चा का विषय रहे वित्त विधेयक (फाइनेन्स बिल) को राज्यसभा में संशोधन के लिए पास कर दिया गया था परंतु सरकार की ओर से लोकसभा के पटल पर इस विधेयक को मानने कि कोई बाध्यता नहीं होती है जिसके तहत सरकार ने इस विधेयक को राज्यसभा द्वारा सुझाए गए संशोधनों को बिना माने ध्वनी मत से पारित करवा लिया.

इस विधेयक में सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करने वाली बात है राजनीतिक पार्टियों को निजी कंपनियों की ओर से मिलनें वाला चंदा. पहले निजी कंपनियों की ओर से राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले इस चंदे की सीमा किसी भी कंपनी के पिछले तीन वर्षो के कुल शुद्ध मुनाफे का 7.5% से ज्यादा नहीं हो सकता था. और साथ ही कंपनी को अपनी पहचान तथा किस राजनीतिक पार्टी को आप यह चंदा देने जा रहे हैं बताना अनिवार्य था. मतलब की कोई भी जानकारी गुप्त रखनें का प्रावधान नहीं था.

परंतु सरकार द्वारा किए गए इस नए संशोधन के तहत किसी भी कंपनी के द्वारा राजनीतिक पार्टी को दिए जाने वाले चंदे की सीमा जो 7.5% थी उसको हटा दिया गया है. मतलब अब कंपनियां चाहे तो कितना मर्जी चंदा राजनीतिक पार्टियों को दे सकती हैं वो भी गुप्त तरीके से क्योकिं अब किस कंपनी ने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है बताने की जरुरत नहीं है. 


ऐसे में सरकार अपने आपको पाक-साफ और पारदर्शी होने का पाखंड़ क्यों करती है, खासकर देश के प्रधान सेवक जो राजनीतिक पार्टियों को पारदर्शिता और ईमानदारी का पाठ पढ़ाते नहीं थकते हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार लगातार जनता के पैसो पर कभी आधार कार्ड तो कभी पैन कार्ड के माध्यम से नज़र रख रही है, लोगों से पारदर्शी होने की उम्मीद रखने से पहले बिना वजह के कानून थोपने वाली इस सरकार को खुद की पारदर्शिता दिखानी होगी परंतु ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है. 

21 March 2017

NHP -2017 की चुनौतियां! 

एक विकासशील देश के लिए अपनी जनता को अच्छे स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करावना एक बड़ी चुनौती होती है, वहीं भारत जैसा विशालकाय देश जो जनसंख्या के पैमाने पर विश्व में दूसरा दर्जा रखता हो उसके लिए यह काम ओर भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है. आज हमारी जनसंख्या 125 करोड़ के आकड़े को पार कर चुकी है. 

देश के हर नागरिक की स्वास्थ्य संबन्धी जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकारों की बनती हैं. स्वास्थ्य एक ऐसा मसला है जो हर आयु वर्ग से जुड़ा होता है मतलब की हमे देश की कुल जनसंख्या को मद्देनज़र रखते हुए स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने की जरूरत होती है. 

इसी बीच सरकार की ओर से NHP( National Health Policy) राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लागू करने के फैसले से कुछ उम्मीद की किरण दिखाई पड़ती है कि सरकार की नियत देश के स्वास्थ्य स्तर को बढा़ने की है. इसी संदर्भ में सरकार की ओर से संसद में लंबित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति संबन्धि बिल पारित कर दिया गया है. नीति का मुख्य उद्देश्य सभी उम्र वर्ग के नागरिकों को उच्च स्तरिय स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है.

इससे पहले इस तरह की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 1983 और अंतिम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2002 में जारी कि गई थी. 2002 की स्वास्थ्य नीति तथा आज की स्वास्थ्य संबन्धी समस्यायों को देखते हुए इस नई नीति को लागू करने का प्रस्ताव संसद में पेश किया गया था जिसको मौजूदा सरकार ने पारित कर दिया है. 

इस नीति के तहत सरकार नें स्वास्थ्य बजट को पहले से 1.5 फिसदी बढा़ने का दावा किया है. इसके तहत 2025 तक औसत आयु सत्तर वर्ष करने तथा शिशु मृत्यु दर घटाने का लक्ष्य रखा गया है. इस तरह के लक्ष्यों की प्राप्ती तब तक संभव नहीं है जब तक स्वास्थ्य विभाग से जुड़े ऊपर से लेकर नीचे तक के तमाम लोग इसको एक लक्ष्य के तौर पर लेकर नहीं चलेंगें.  

काग़जी तौर पर सरकारों की ओर से तमाम सुविधाएं देने की बात कही जाती हैं परंतु ज़मीनी हकीकत तो कुछ ओर ही बया करती है. देश में ग्रांमीण स्तर पर प्राथमिक उपचार के लिए 'प्राथमिक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र' स्थापित किए गए है. 

ये प्राथमिक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र एक निश्चित जनसंख्या वाले गाँवों व कस्बों में बनाए गए है तथा आस-पास के गांव के लोगो को भी इनसे जो़ड़ा गया है. यह जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा सरकारी तंत्र का पहला उपचार केन्द्र है जहां पर आधिकारिक तौर पर बामुश्किल एक एम.बी.बी.एस और एक बी.डी.एस डॉ की तैनाती की होती है और साथ में कुल तीन नर्स वो भी पाली के हिसाब से काम देखती हैं. 

वही अगर निजी अस्पतालों की बात करें तो इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही हैं आर्थिक रूप से मजबूत परिवारों के बच्चें मैडिकल की पढ़ाई करने के बाद निजी क्लीनिक खोलनें कि लालसा रखते हैं या फिर विदेशों में जाकर काम करना पसंद करते हैं.

MCI (MEDICAL COUNCIL OF INDIA) के अनुसार 2013 से 2016 के बीच भारत में मैडिकल की पढा़ई करने के बाद लगभग 4701 बच्चों नें विदेश का रुख किया है. ऐसी स्थिति में बहुत कम बच्चें मैडिकल कि पढा़ई करने के बाद सरकारी विभाग में काम करना चाहते हैं.

इसका मुख्य कारण सरकार की ओर से चिकित्सकों को दी जाने वाली सुविधाओं की उपलब्धता का न होना है. ओर-तो-ओर सरकारें चिकित्सकों की सुरक्षा तक का अस्पतालों में प्रबंध नहीं कर पा रही है. हाल ही में अनेकों ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें डॉक्टरो को सरेआम पिटने के मामलें सामने आए हैं. महाराष्ट्र में चिकित्सकों कि सुरक्षा का मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि सरकारी अस्पतालों में अपनी सेवाएं देने के लिए नए दौर के चिकित्सक आगे आएगें.

MCI  (MEDICAL COUNCIL OF INDIA) कि रिपोर्ट के अनुसार देश में डॉक्टरो की बड़े स्तर पर कमी है. MCI  की ताजा रिपोर्ट के अनुसार आज देश में पाँच लाख से ज्यादा डॅाक्टरों की कमी है. इन आँकडों को पार करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1000 लोगों पर एक डॉ की जरूरत है, लेकिन भारत में यह आँकड़ा 1650 से ज्यादा लोगों पर एक डॉ का है. ऐसे में यह लोगों के स्वास्थ्य की गारंटी से लेकर डॉक्टरों पर बढ़ते काम का दबाव, चिंता का विषय है. 

ऐसा भी नहीं है कि भारत ही मात्र ऐसा देश है जिसमें डॉक्टरों की कमी हो WHO के अंतर्गत आने वाले कुल देशों में से 44 फिसदी देश ऐसे हैं जिनमें डॉक्टरों की कमी की समस्या आम हैं. वहीं दूसरी ओर रुस में यह स्थिति सबसे अच्छी है जहाँ पर  1000 की आबादी पर तीन डॉ हैं. 

भारत में कागजी नीतियां बनाने पर तो बहुत जोर दिया जाता है राजनीतिक पार्टीयां मात्र नीतियों और कानूनों के नाम पर जनता को भाषणों के जरिए फुसला कर चुनावी अखाड़ों में जीत भी जाती हैं परंतु आम जनता फिर उसी अखाड़े में चीत हुई दिखाई देती है.
अत: ऐसे में इन तमाम समस्यायों को देखते हुए सरकार की ओर से लाई गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को ज़मीनी स्तर पर लागू करना सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी. 

19 March 2017

योगी'राज' की ताजपोशी के राजनीतिक मायनें! 


भारतीय जनता पार्टी ने उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में अविश्वसनीय जीत के बाद चौंकाने वाला निर्णय लेते हुए आदित्यनाथ योगी को मुख्यमंत्री बना कर सबको चकित कर दिया. पिछले पूरे एक सप्ताह से योगी का नाम मुख्यमंत्री की रेस में जरुर था परंतु उनको ही विधायक दल का नेता चुन लिया जाएगा इसका अनुमान न के बराबर था. वहीं आदित्यनाथ योगी के साथ दो उपमुख्यमंत्रीयों का चुना जाना सपष्ट रुप से जातिगत राजनीति की बिसात है. केशव प्रसाद मोर्य जो एक पिछड़े समाज का चेहरा है तो दिनेश शर्मा ब्राहामण समाज का मुखौटा हैं. 

वहीं भाजपा की ओर से इस बात का हवाला दिया जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी ने प्रदेश बड़ा होने के नाते दो-दो उपमुख्यमंत्री रखे हैं. ऐसे में आज से पहले मायावती ने शासन चलाया, अखिलेश ने शासन चलाया तो क्या उनकें शासनकाल में उत्तरप्रदेश का आकार छोटा था जो अब भाजपा के आते ही बढ़ गया. 

खैर ये देखने वाली बात होगी की दो-दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री योगी कैसे तालमेल बिठाएंगे और अपने चुनावी मुद्दों को अमलीजामा कैसे पहनाएंगे जिसमे भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश, गुंडाराज खत्म करना, सुशासन, युवाओं के लिए रोजगार, ये वो तमाम विकास के मुद्दे हैं जिनके सहारे भाजपा नेता उत्तरप्रदेश की जनता के बीच गए थे.
उत्तरप्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने 1990 के अयोध्या राम मंदिर आंदोलन से प्रभावित होकर गोरखपुर मठ के महंत अविध्यानाथ के संपर्क में आकर गृह जीवन से त्याग ले लिया था. राम लला का मंदिर तो आज तक नहीं बना लेकिन राम मंदिर आंदोलन से प्रभावित होकर आदित्यनाथ योगी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जरुर बन गए हैं.
योगी की हिन्दु कट्टरवादी छवी जिसके लिए वो जाने जाते है या मशहूर हैं को यू-टयूब पर उपलब्ध भाषणों से समझा जा सकता है. अपने भड़काऊ भाषणों की वजह से योगी पर कोर्ट में केस की सुनवाई भी चल रही है. जो जानकारी उन्होनें सासंद उम्मीद्वार के रुप में दिए गए अपने हलफनामें में भी स्वीकार है.  

योगी के दूसरे रूप की बात करे तो वह लगातार गोरखपुर से पांच बार सासंद रह चुके हैं. 1998 में पहली बार 26 वर्ष की उम्र में सासंद बनने का रिकोर्ड़ भी योगी के नाम है. 

कुल मिलाकर जो जीता वही सिंकदर वाली कहावत योगी पर चरितार्थ होती हैं.  अब देखना होगा की योगी उत्तरप्रदेश को उत्तमप्रदेश बना पाता हैं या नहीं.

20 January 2017

चुनाव और चुनौतियां.




चुनावों को भारत के लोकतंत्र का त्योहार कहा जाता है जिसको मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को मत देकर उत्सव के रूप में मनाते हैं. भारत दुनियां का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। परंतु चुनावों को लेकर हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत नहीं है जितनी इससे उम्मीद की जानी चाहिए.

आज भी हमारी संसद व राज्य की विधानसभाओं में अपराधी पृष्टभूमि के अनेक नेता चौकड़ी बिछाए बैठे हैं. ADR(Association For Democratic Reforms) की  रिपोर्ट के अनुसार 2014 की लोकसभा में 543 में से 185 (34 प्रतिशत) सासंदो पर आपराधिक मामलें दर्ज़ हैं. वहीं 112 (21प्रतिशत) सांसदों पर गंभीर आपराधिक मामलें दर्ज हैं. गंभीर आपराधिक मामलें ग़ैर ज़मानती होने के साथ इसमें कम-से-कम पांच साल या उससे अधिक सजा का प्रावधान है.

आदर्श चुनाव आचार संहिता की नेताओं द्वारा खुल्लेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं, परंतु फिर भी आज तक किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द करने की हिम्मत चुनाव आयोग ने नहीं दिखाई है. वहीं ग़रीब मतदाताओं पर बाहुबलियों द्वारा दबाव डाल कर वोट डलवाने के भी मामले सामने आते रहते हैं.  

अगर आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के मतदाता अपनी मर्जी से वोट नहीं डाल सकते तो दुनियां का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश होने का कोई महत्व नहीं रह जाता. चुनाव आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद बाहुबली लोग अपने बल का दुरूपयोग करने से बाज नहीं आते हैं.

यहां तथाकथित नेता चुनाव प्रचार के नाम पर समाज में ज़हर घोलने का असामाजिक काम करते हैं परंतु चुनाव आयोग मात्र प्राथमिकी दर्ज करवाने तक सीमित रह जाता है. चुनाव आयोग की और से उन पर कोई ठोस कार्रवाई ना होने से ये तथाकथित नेता ध्रुवीकरण करने में कामयाब भी हो जाते हैं.

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में चुनाव सुधारों को देखते हुए जनप्रतिनिधि कानून 1952 के तहत चुनाव प्रचार के दौरान धर्म व जाति के आधार पर वोट मांगने वाले नेताओं के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया है परंतु इसके बावजूद भी नेता जाति, धर्म के आधार पर राजनीतिक गठजोड़ बनाते नज़र आ रहे हैं. 

वहीं मीडिया की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपनी रिपोर्टिंग में चुनावों का राजनीतिक विश्लेषण जाति व धर्म के आँकड़ों के आधार पर करने से बचे. 

चुनावों में चुनाव प्रचार खर्च को लेकर भी चुनाव आयोग के सामने अनेक चुनौतियां रहती हैं. हाल ही में चुनाव खर्चों संबन्धी सुझाव पेश किए जिनमें सरकारी खर्च पर चुनाव लड़ानें की बात कही गई परंतु इस सुझाव में भी काफी सारी खामियां निकाली जा चुकीं हैं. 

वहीं एक जागरूक मतदाता का भी यह दायित्व बनता है कि वह जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर वोट ना कर के उम्मीदवार की शिक्षा, विकास कार्य करने की क्षमता, जनता की मूलभूत अवश्यकताओं को पूरा करने का माद्दा रखनें वाले उम्मीदवार का चयन करें. 



18 January 2017

राजनीतिक पार्टियो में पारदर्शीता का अवसर !


देश के प्रधानमंत्री ने राजनीतिक पार्टियों को चंदे के रूप में मिलने वाले काले धन को और पार्टियों से जुड़े भ्रष्टाचार को खत्म करने की अपील कर राजनीतिक पार्टियो से ईमानदारी की बात कही है।

राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे को लेकर चुनान आयोग भी लम्बे असरे से अपनी चिंता जताता रहा हैं क्योकि किसी भी पार्टी को चंदे के रूप में 20 हजार से ज्यादा की राशि ही चैक या कैशलेस के रूप में स्विकार्य है, 20 हजार से कम की राशि को चैक से देने की कोई अनिवार्यता नहीं है इस रास्ते के जरिए ये तमाम पीर्टिया चंदे में आए पैसे को 20 हजार से कम दिखाती थी लेकिन अब 20 हजार की जगह 2 हजार से ज्यादा की राशि को चैक के जरिए दिए जाने की बात कही जा रही हैं। लेकिन यह नया तरीका भी  काले धन को चंदे के रूप में स्विकार कर पार्टियों के लिए एक रास्ता छोड़ रहा है भले ही कम राशि के रूप में हो।


एक ओर जब देश की अर्थव्यवस्था को केश लैस करनें की बात की जा रही है हालांकि देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुचनें में इसे कई दशक लग सकते हैं। तो क्यों न राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले एक ₹ के चंदे की राशि को भी कैश लैस भूगतान के जरिए लिया जाए ?

सबसे पहले भाजपा को इसकी शुरुआत करनी चाहिए क्योंकि भाजपा शासित मोदी की केंद्र सरकार ने ही देश को कैश लैस और वितीय रूप से डिजिटल करने का बीड़ा उठाया है। अगर मोदी साहब ऐसा करने का साहस करते है तो जाहिर है दूसरी पार्टियों पर भी जनता का दबाव होगा, कि वो भी चंदे में मिलने वाली राशि को  कैश में ना लेकर चैक, ऑनलाइन बैंकिग या मोबाईल वॅालेट के जरिए ही स्वीकार करें।

वही दूसरी ओर राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाने की बात लगातार चलती आ रही है। सूचना आयोग नें 2013 में सभी राजनीतिक पार्टियों को RTI के दायरे में लाने का फैसला किया था। लेकिन किसी भी पार्टी ने इसे लागू नहीं किया। अब यह मामला देश के सर्वोच्च न्याया़लय के अधीन चल रहा है। वहीं मोदी अगर पारदर्शिता की बात करते है तो सर्वोच्च न्याया़लय के फैसले से पहले ही उनको अपनी पार्टी को RTI के दायरे मे लाना चाहिए

लेकिन कहीं मोदी पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को देखते हुए तो ़इस तरह की ब्यानबाजी नहीं कर रहे हों जिससे वो अपनी पार्टी को साफ-सुथरी होने का प्रमाण-पत्र अपनी रैलियों के दौरान अपने लच्छेदार भाषणों में देते नजर आए।
उनकें के लिए बेहतर होगा की वो अपनी पार्टी को मिलने वाले चंदे को कैशलेस करे और अपनी पार्टी को RTI कानून के दायरे में लेकर आए तब जनता में संदेश जाएगा की प्रधानमंती असल में राजनीतिक पार्टियों में पारदर्शिता  और ईमानदारी चाहते हैं। अगर वो ऐसा करते हैं तो इन पांच राज्यो में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को परोक्ष रूप से फायदा हो सकता है और साथ ही कम-से-कम इस मामलेृ में तो उनकी  कथनी और करनी में अंतर खत्म हो ही जाएगा
- गौरव कुमार