26 June 2020

एक गलतफहमी...

आज से 23 साल पहले आंखें खुली और पहली बार दुनिया देखी. दुनिया में कुछ अपने और कुछ पराये जिन्हे हम समाज कहते हैं,जाहिर सी बात है जब तक मुझे इल्म भी नहीं था कि लड़की क्या होती है, सबने कह दिया होगा अरे लड़की हुई है कोई ना अगली बार लड़का होगा. 

लड़की कौन है ये और लड़का इतना क्यों जरूरी है.सवाल तो मन में होता ही है, बचपन से लेकर बड़े होने तक हर चीज लड़के को पहले दी जाती है. उसके खिलौने, उसकी साइकिल, उसकी पढ़ाई सब मानो उसका ही है बस तो फिर हमे गलतफहमी होना लाज़मी है कि काश में भी लड़का होती तो शायद सभी मुझे इतना ही प्यार करते. 

हां बहुत बुरा लगता है जब लड़की की पढ़ाई बंद करवा कर लड़के को कॉन्वेंट स्कूल में भेजा जाता है तो फिर आता है काश मैं लड़का होती. पर कभी समझ नहीं आता जैसे उसमें उन्के जीन्स हैं मुझमें भी,वो उनकी औलाद है मैं भी हूं फिर ये भेदभाव क्यों.इस कशमकश में की यार भगवान मुझे लड़की क्यों बनाया जिंदगी का एक चौथाई हिस्सा निकल जाता है.


असली इम्तिहान अब शुरू होता है जब जिंदगी समझ आने लगती है जब ये पता लगता है कि शुक्र है कि मैं लड़की हूं, लड़का नहीं जब हम भगवान को दिल से शुक्रिया करते हैं कि हर जन्म में मोहे बिटिया ही कीजो...हैरानी हो रही होगी कि मैं ऐसा क्यों कह रही हूं...


आपके सवाल का जवाब

आपके भाई के पैदा होने पर सभी लोग बहुत खुश होते हैं. उसे सभी महंगे खिलौने दिलवाये जाते हैं, कॉन्वेंट की पढ़ाई से लेकर टॉप क्लास तक डॉनेशन दिया जाता है पर क्यों...अभी नहीं समझ आया तो गौर से सोचिए आपकी शादी के लिए मां-बाप लड़का ढूंढ रहे हैं.उन्कों एक लड़का पसंद आया बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती, उसके बाद पता किया जाता है कि उसकी कीमत क्या है मतलब आपके पापा जिन्होने हो सकता है आज तक आपकी बहुत सी मांगे पूरी नहीं की होंगी आपके लिए जीवनसाथी के रूप में लड़का खरीदते हैं क्योंकि अगर उन्होनें अपने बेटे को बेचने के लिए तैयार ना किया होता तो आज उन्कों  किसी और का बेटा खरीदना नहीं पड़ता...तो मुबारक हो आप लड़की हैं आपकी कीमत रुपयों में तय नहीं की जाएगी होप कि आपकों गर्व होगा कि आप लड़की हैं.


मैं खुशकिस्मत हूं क्योकिं मैं लड़की हूं और ना ही मेरे माँ-पापा ने मेरे भाई की कीमत लगाने के लिये पढ़ाया और ना ही कभी ऐसा हुआ की मेरी डिमानड्स ना पूरी हुई हों...मेरे लिये जीवनसाथी खरीदने से ज्यादा उनकों मुझे पढ़ाना जरूरी लगा....शुक्रिया पापा धर्मपाल मोठसरा; माँ मूर्ति मोठसरा


- शीनू मोठसरा

26 March 2020

एक बार फिर जी लो...


मार्च 2020 अभी सब नोर्मल ही था स्कूल जाते बच्चे को एग्जाम की चिंता, SSC और UPSC के सारे एस्पाइरेंट्स अपना बेस्ट देने में लगे थे। घर पर मां को खाने और सफाई की चिंता और पीछे बहुत सालों से पापा की ऑफिस वाली वही जिंदगी। ताजुब की बात ये थी की एक उम्र सी बीत गई थी वक्त को  ठहरे हुये सबकी जिंदगियां इतनी तेजी से चल रही थीं की किसी ने रुकने का सोचा ही नहीं, सबको आगे ही बढ़ना था। एक खबर थी अखबारों में कि दुनियां के एक हिस्से में कुछ हो रहा था पर अभी तक हमारे यहां जिंदगी रफ्तार में ही थी, कुछ लोगों ने मजाक भी बनाया की जो बुरा करते हैं उनके साथ ही होगा हमें कुछ नहीं होगा।

मेरी दादी एक कहानी सुनाती थी कि आज से बहुत साल पहले कभी महामारी आयी थी ऐसे हालात थे उस वक्त की अगर एक का अंतिम संस्कार करके आए तो दूसरी जिंगदी उससे पहले दम तोड़ रही थी। इस कहानी वाले लोगों में मेरे पूर्वजों में से भी तीन बच्चों ने ऐसे ही अपना दम तोड़ा। पर यकीन मानिए हमेशा ऐसा लगता था कि अब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऐसा आगे तो शायद कुछ ना हो।तीसरे विश्वयुद्ध का डर तो दिल में था पर सोचा ना था कि वो किसी वायरस के रूप में आएगा जहां वायरस बनाम पूरी दुनिया होगी। 

आप सोचकर देखिये हमारी जिंदगी इतनी रफ्तार से चल रही थी कि ब्रेक लगने पर भी झटका तेजी से लगता पर यहां पर तो रुकना था। कई बार सुना था लॉकडाउन के बारे में कश्मीर के उन लोगों के लिये दुख भी हुआ जो एक लम्बे वक्त तक अपने घरों में कैद रहे पर कभी उनका दर्द महसूस नहीं हुआ क्योकिं कभी कुछ ऐसा जिया ही नहीं। हाँ  एक फ़र्क है उनमें और हममें शायद उन्हें मौत का डर नहीं रहा पर अब हमें है। हम अपने आस-पास पड़ोस के उन लोगों से भी डर रहे हैं जिनके साथ हम जिन्दगी के इतने साल रहे हैं। 

एक ही गुजारिश है मेरी आप सब से की माना  की हम अपनी मर्जी से नहीं ठहरे हैं। पर अब जब हम रुक ही गए हैं तो थोड़ा आराम कर लिजिये, जिन्दगी का कुछ वक्त खुद के लिये निकालिए और जो बीत गया उस पर एक बार झांक कर देखिये की इस रेस में आगे बढ़ते-बढ़ते कहीं हम खुद को ही ना भूल गये हों। 

अगर आपको अपना घर कैद लग रहा है तो एक बार अपने जीवनसाथी की शिकायतें सुनिये और समझने की कोशिश करके देखिये। बुजुर्ग माँ बाप को भी जिन्होनें जिन्दगी दी शुक्रिया कह दीजिये। बहन भाई की जिन शरारतों ने जिन्दगी में रंग भर दिये उन्हे फिर याद कर लिजिये। उन बच्चों के साथ जिनकों समय ना होने के कारण आपने वीडियोगेम या मोबाइल फोन दिये ताकि आपकी कमी शायद वो चीजें पूरी कर दें उनकों वो वक्त दे के देखिये यकीन मानिये कैद कब जन्नत हो जाएगी और वक्त हँसते कब गुजर जाएगा पता ही नहीं लगेगा। अपनी दुनिया उस घर की दिवारों में फिर जन्नत  बनाकर यकीन मानिये आप खुद को भी सुरक्षितरखेंगे अपने परिवार को भी और पूरी दुनिया भी आपकी कर्जदार रहेगी।

शुक्रिया
मुस्कुराते रहिये
शीनू मोठसरा



29 July 2018



कालबेलिया समुदाय   

साँप की कलाकृतियों से सजे चमकदार, चाँदी और शीशे से सजे काले रंग के परिधानों में सपेरों की बीन के लहरें, ढोलक की थाप, डफली और खंजरी जैसे वाद्य यंत्रो से निकली धुन पर लोक नृत्य करती कालबेलिया घुमंतु जनजाति की महिलाएँ सदियों से राजस्थान के कालबेलिया लोक नृत्य को संजोए हुए हैं।









कालबेलिया लोक नृत्य राजस्थान का बहुत चर्चित और प्रसिद्ध लोक नृत्य है। इस लोक नृत्य की प्रस्तुति कालबेलिया नाम की ही जनजाति के लोगों द्वारा की जाती है। इस लोक नृत्य का नाम भी इसी कालबेलिया जनजाति के नाम पर पड़ा है। इस नृत्य की प्रस्तुति ख़ास उत्सवों पर दी जाती है। कालबेलिया नृत्य की धूम भारत ही नहीं पूरे विश्व में मानी जाती है।


2010 में यूनेस्को ने कालबेलिया नृत्य को अमूर्त विरासत सूची में डाल कर इस लोक नृत्य के साथ-साथ कालबेलिया समुदाय को भी विश्व स्तर पर पहचान दी। इस नृत्य को देखने और सीखने के लिए लोग विदेशों से आते हैं।   

ये लोग गौरखनाथ को अपना देवता मानते हैं तथा सर्प पूजा में विश्वास रखते है। कालबेलिया समुदाय के लोगों का मुख्य पेशा साँप पकड़ना, सर्प विष का व्यापार करना, तथा सर्प दंश का उपचार करना रहा है। परंतु 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम आने के बाद से इन लोगों के साँप पकड़ने तथा इससे जुड़े छोटे-मोटे काम भी बंद हो गए।

इन लोगों के पास स्थाई मकान ना होने के कारण ये एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते हैँ। निरंतर घूमते रहने की वजह से ही कालबेलियों  का राजस्थान की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं से लगाव हो गया। फिर ये लोग इन वनस्पतियों से जुड़ी हुई तरह-तरह की जड़ी-बुटियां बनाने लगे तथा इन्हे बेचकर ही थोड़ा बहुत कमाते रहे थे परंतु अब वह भी नहीं रहा। 


विडंबना देखिए जिस जनजाति ने राजस्थान के लोक नृत्य को संजोए रखा और विश्वपटल पर ख़्याति दिलाई, उसी जनजाति की, समाज और सत्ताशीनों ने अनदेखी की। कालबेलिया जनजाति के लोगों के साथ आज भी समाज अस्पृश्यता का व्यवहार करता है। ये लोग जिस गाँव में ठरहरने के लिए डेरा डालते है वहाँ के लोग इनकों कुछ ही दिनों के अंदर वहाँ से दूसरी जगह जाने पर मजबूर कर देते हैं।

स्थानीय लोगों की ओर से इन लोगों पर चोरी और झगड़ा करने का आरोप लगाया जाता है जिसके बाद ये लोग उस स्थान को छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। समाज ने कालबेलिया जनजाति को मुख्यधारा से विमुख कर मानो बहती नदी के किनारे छोड़ दिया हो।

आज इस समुदाय के लोग दो जून की रोटी के लिए तंगहाल स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ये लोग सड़कों, चौराहों पर अपनी बीन के लहरे से मनोरंजन कर लोगों की कृपाद्रष्टि के पात्र होकर गुजर-बसर कर रहे हैं। 






16 March 2018

जाति के नाम पर गर्व करने लायक क्या ?  


जाति के बखान से लोगों को कौन-से रस की तृप्ति होती है समझ से परे है. 


10 November 2017

चन्द्रशेखर पर रासुका ? 

क्योंकि चन्द्रशेखर किसी राजनेता का बेटा नहीं है, क्योंकि वह किसी व्यवसायी का बेटा नहीं है क्योंकि वह किसी रसूख़दार के घर पैदा नहीं हुआ है.

इसी साल मई-जून में उत्तरप्रदेश के सहारनपुर ज़िले के शब्बीरपुर में दलितों और ठाकुरों के बीच हिंसक घटनाएं हुई थीं. ठाकुरों ने बाबा साहेब अंबेड़कर के जन्मोत्सव पर दलित समुदाय को अम्बेड़कर मूर्ति स्थापना व झलसा निकालने से रोका था. वहीं इसके बाद फिर अगले ही महीने माहाराणा प्रताप जयंती पर दलितों ने उस बात का हवाला देते हुए कि उन्हें बाबा साहेब के जन्मोत्सव पर कार्यक्रम नहीं करने दिया गया था, तो अब वो भी किसी तरह का जुलूस नहीं निकालने देंगे. 




इसी टकराव की स्थति ने दोनों समुदायों के बीच हिसंक घटनाओं को अंजाम दिया. लगभग एक महीने तक रह-रहकर चली इन हिंसक घटनाओं में दलितों की बस्ती में प्रशासन की मौजूदगी में आग लगा दी गई, इन लोगों पर खुलेआम तलवारों से हमला किया गया तथा महिलाओं के शोषण की घटनाएं भी सामने आई. 

वहीं दलितों पर अत्याचार के विरोध में खड़े हुए भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर पर देशद्रोह का केस बना कर जेल में डाला गया. चन्द्रशेखर ने भीम आर्मी की स्थापना 2015 में की थी जिसका मकसद आए दिन दलित समुदाय पर होते आ रहे हिंसक हमलों का प्रतिकार करना था. इस संगठन का दावा है कि ये लोग संविधान के दायरे में रहकर दलितों पर होने वाली हिंसक घटनाओं का प्रतिकार करते आए हैं. 



वही कुछ लोग भीम आर्मी के अस्तित्व पर ही उंगली उठा रहे हैं कि इस तरह के संगठन समाज को बांटने का काम करते हैं परंतु इस प्रकार के तर्क देने वालों को यह नहीं भुलना चाहिए की इसी देश में हिन्दु युवा वाहिनी, हिन्दु सेना, राजपूत करणी सेना, क्षत्रिय सेना जैसे तमाम संगठन हैं. वहीं अगर गौरक्षा के लिए भारतीय गौरक्षक दल हो सकता है, तो अपने लोगों की रक्षा के लिए चन्द्रशेखर भीम आर्मी संगठन बनाता है तो इसमें ग़लत क्या है

चंद्रशेखर को कभी नक्सली कहा जाता है तो कभी प्रदेश की क़ानून व्यवस्था भंग करने के आरोपी के तौर पर रासुका( राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) लगाया जाता है.परंतु दलित बस्ती में आग लगाने वाले तथा उन लोगों पर जुल्म डहाने वाले दबंग और रसुखदारों को अब तक जे़ल में भी नहीं डाला गया है. शेर सिंह राणा जो सांसद फुलन देवी की हत्या में सजायाफ़्ता है और अभी जमानत पर हैं, उस पर लोगों ने आरोप लगाए हैं कि इस घटना के पीछे शेर सिंह राणा का हाथ है. ऐसे मे यह चिंता का विषय है कि हाशिए के लोगों के लिए क़ानून के हाथ छोटे क्यो पड़ जाते हैं. 

चन्द्रशेखर आज़ाद का भीम आर्मी बनाने के पीछे का तर्क है कि दलितों पर आए दिन हमले होते रहते हैं तथा दलित समाज को नीचा दिखाने का प्रयास हमेशा से होता रहा है. जिसका कारण है, लम्बे अरसे से अपने सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीनें के सवैंधानिक अधिकार को आज तक भी ये लोग आत्मसात नहीं कर पाए हैं. वही आज दलित युवा पढ़-लिख कर आगे बढ़ रहें है तथा वे अपने हक़ों और अधिकारों को प्राप्त करने के लिए रास्ता अख्तियार करना जानते हैं.



चंद्रशेखर के सोशल मीडिया पर एक आह्वान पर हज़ारों युवा दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्र हो जाते हैं. यह पहला मौका था जब नई पीढी़ के पढ़े-लिखे दलित युवा देश भर से इतनी बड़ी संख्या में एकत्र हुए हों. इन लोगों के लिए सोशल मीडिया वरदान की तरह काम कर रहा है क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया में इन लोगों की आवाज़ उठाने वाला कोई दिखाई नहीं पड़ता है. 

1973 की रासुका से जुड़ी एक रिपोर्ट के अनुसार 72 फीसदी लोगों पर लगाया गया रासुका ग़लत साबित हुआ जिसे बाद में हटाना पड़ा इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि सत्ताधारी लोग किस तरह से रासुका का प्रयोग उनकों चुनौती देने वालों के खिलाफ करती आईं हैं. ऐसा ही चन्द्रशेखर के मामले में भी दिखाई दे रहा है. चन्द्रशेखर को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन पर दर्ज सभी मामलों में जमानत दे दी थी परंतु जिस दिन 'आजाद' को आजाद होना था उसी दिन सरकार ने रासुका लगा कर 'आजाद' को फिर से कैद कर दिया. 



अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया के ज़रिए चन्द्रशेखर की एक तस्वीर सामने आई जिसमें चन्द्रशेखर व्हीलचेयर पर बैठा हुआ दिखाई दिया था इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि चन्द्रशेखर के साथ जेल प्रशासन किस तरह पेश आ रहा है.  क्योंकि चन्द्रशेखर किसी राजनेता का बेटा नहीं है, क्योंकि वह किसी व्यवसायी का बेटा नहीं है क्योंकि वह किसी रसूख़दार के घर पैदा नहीं हुआ शायद यही वजह है कि जो चन्द्रशेखर मुच्छो में तांव देकर अपने पैरो पर जेल गया था वह अब व्हीलचेयर पर दिखाई दे रहा है.  

17 October 2017

ताजमहल पर कर्कश संगीत।


ताजमहल पर कर्कश संगीत।   

"कैसा इतिहास, कहाँ का इतिहास, कौन-सा इतिहास, हम इतिहास बदल देंगें". ये वाक्य कहने वाला इतिहास का कैसा छात्र रहा होगा, आप इस ब्यान से अंदाजा लगा सकते हैं. 











यह ब्यान उतर प्रदेश में मेरठ की सरधना सीट से विधायक संगीत सोम ने दिया है संगीत सोम हमेशा से अपने उट-पटागं ब्यानों के लिए जाने जाते रहे हैं. कभी अपने चुनाव प्रचार में दंगों के समय के भाषण चला कर तो कभी सरेआम आम सभाओं में भड़काऊ भाषण देकर नफ़रत के बीज बोते रहे हैं. इसे हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही समझ लीजिए देश के कुछ नेता अपने ओछे कामों से ही राजनीति में बने रहते हैं. इससे पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी भी, "ताजमहल पर गर्व करने जैसी कोई बात नहीं है", कह कर उनका और उनकी सरकार का ताजमहल के प्रति विद्वेश दिखा चुके हैं.    

चलों इसी बहाने ही सही इन लोगों ने यह तो स्वीकार किया की ताजमहल को शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था. वरना इससे पहले ये लोग ताजमहल के इस अस्तित्व को ही नकार रहे थे जिसके चलते सुब्रमण्यन स्वामी ने तो ताजमहल को लेकर केस भी फाइल किया हुआ है. देश की एक विचारधारा के धडे़ द्वारा ताजमहल को शिवालय़ बताया जाता रहा है तो वहीं सरकार के पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने अपने ब्यान में कहाँ कि यह सब निराधार बातें हैं, ताजमहल, ताजमहल ही है.   

कभी मुग़ल काल में अकबराबाद के नाम से जाना जाने वाला आगरा शहर अकबर, जहांगीर और शाहजाहं के काल में राजधानी भी रहा है. इस शहर को चार चांद लगाने का काम शाहजहां ने ताजमहल बनवा कर किया था. आगरा की पहचान ताजमहल से ही रही है. 'ताज आगरा की आबों हवा में है, ताज से आगरा की हवा में ताजगी है. ताज से आगरा की फिज्जा में मोहब्बत है, ताजमहल आगरा के सिर का ताज है. ताजमहल आगरा ही नहीं भारत को भी विश्वपटल पर पहचान दिलाने वाली ऐतिहासिक इमारत है'. ताज के ये कसीदे मेरे एक मित्र ने पढ़े हैं जो आगरा के ही रहने वाला है. 

ताजमहल जिसको खड़े हुए आज लगभग 350 साल से ज्यादा हो चुके हैं उम्र के लिहाज से बुजुर्ग होते हुए भी यह जवानों से ज्यादा कमाई कर रहा है. टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन सालों में ताजमहल की कमाई लगभग 75 करोड़ रही है जो अपने आप में भारत के पर्यटन स्थलों में सबसे ज्यादा है.  

शाहजहां बहुत बड़े वास्तुकला प्रेमी थे उनके काल में ही सबसे ज्यादा भव्य ईमारतों का निर्माण हुआ था. आगरा के ताजमहल के अलावा आगरा का लाल किला (जहां पर शाहजहां को उन्कें बेटे औरंगजेब ने बंदी बना कर रखा था), व दिल्ली का लाल किला जिसकी प्राचीर से आजादी के बाद से सभी प्रधानमंत्री तिरंगा लहराते आए हैं, ये सब ऐतिहासिक ईमारतों का निर्माण करवाने वाले शाहजाहं ही थे. वहीं दिल्ली के लाल किले में स्थित दिवाने-ए-खास के बारे में तो मशहूर कवि अमिर खुसरों ने यहां तक लिखा है कि "धरती पर अगर कही स्वर्ग है तो यही है, यही है, यही है".  

ताजमहल से जुड़े इतिहास के इस पहलू से भी मुंह नही मोड़ा जा सकता कि ताजमहल को बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए गए थे जो उस समय का एक बहुत बड़ा अमानवीय कृत्य रहा होगा जिसमें लगभग बीस हजार मजदूरों को अपंग कर दिया गया था. शाहजांह को डर था कहीं कोई दूसरा ताजमहल ना बनवा दे परंतु यह उनकीं सबसे बड़ी गलती रही क्योंकि उस समय कोई आर्थिक रुप से इतना मजबूत नहीं था की ताजमहल बनवा सकता. 

लेकिन हमे नहीं भूलना चाहिए कि वो दौर राजशाही का दौर था जिसमे राजा को जो ठीक लगे वही होता था वो एक तरह से तानाशाही का काल था. कुछ लोग आज उन मजदूरों पर हुए अन्याय को लेकर ताजमहल की रंगत को कम करने का प्रयास कर रहे हैं, हां उन सबके साथ अन्याय हुआ इस बात में कोई दोराय नहीं हो सकती, परंतु आज जो लोकशाही के दौर में हो रहा है, आज देश में लोगों को गाय के नाम पर, जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, स्वतंत्र लेखन के नाम पर मारा जा रहा है, उसका क्या? ऐसे में संगीत सोम का कर्कश संगीत इन लोगों के न्याय के लिए भी आलाप करेगा क्या? शायद कभी नहीं. 

राजनीति में इस तरह की मानसिकता रखने वाले नेताओं का स्कोप बढ़ता जा रहा है जो अपनी ब्यानबाजी से समाज को बांटने, नफरत फैलाने का काम करते है सभी पार्टियों में इस तरह के नेता आपको देखने को मिल जाएंगे परंतु भाजपा इस मामले में ज्यादा आगे निकल चुकी है।

31 March 2017

सरकार की पारदर्शिता पर सवाल.


हाल के दिनों में संसद के दोनों सदनों में चर्चा का विषय रहे वित्त विधेयक (फाइनेन्स बिल) को राज्यसभा में संशोधन के लिए पास कर दिया गया था परंतु सरकार की ओर से लोकसभा के पटल पर इस विधेयक को मानने कि कोई बाध्यता नहीं होती है जिसके तहत सरकार ने इस विधेयक को राज्यसभा द्वारा सुझाए गए संशोधनों को बिना माने ध्वनी मत से पारित करवा लिया.

इस विधेयक में सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करने वाली बात है राजनीतिक पार्टियों को निजी कंपनियों की ओर से मिलनें वाला चंदा. पहले निजी कंपनियों की ओर से राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले इस चंदे की सीमा किसी भी कंपनी के पिछले तीन वर्षो के कुल शुद्ध मुनाफे का 7.5% से ज्यादा नहीं हो सकता था. और साथ ही कंपनी को अपनी पहचान तथा किस राजनीतिक पार्टी को आप यह चंदा देने जा रहे हैं बताना अनिवार्य था. मतलब की कोई भी जानकारी गुप्त रखनें का प्रावधान नहीं था.

परंतु सरकार द्वारा किए गए इस नए संशोधन के तहत किसी भी कंपनी के द्वारा राजनीतिक पार्टी को दिए जाने वाले चंदे की सीमा जो 7.5% थी उसको हटा दिया गया है. मतलब अब कंपनियां चाहे तो कितना मर्जी चंदा राजनीतिक पार्टियों को दे सकती हैं वो भी गुप्त तरीके से क्योकिं अब किस कंपनी ने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है बताने की जरुरत नहीं है. 


ऐसे में सरकार अपने आपको पाक-साफ और पारदर्शी होने का पाखंड़ क्यों करती है, खासकर देश के प्रधान सेवक जो राजनीतिक पार्टियों को पारदर्शिता और ईमानदारी का पाठ पढ़ाते नहीं थकते हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार लगातार जनता के पैसो पर कभी आधार कार्ड तो कभी पैन कार्ड के माध्यम से नज़र रख रही है, लोगों से पारदर्शी होने की उम्मीद रखने से पहले बिना वजह के कानून थोपने वाली इस सरकार को खुद की पारदर्शिता दिखानी होगी परंतु ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है.